उत्तराखंड के एक छोटे
से शहर में मेरा जन्म हुआ था। मेरे दो छोटे भाई थे । मेरे बाबू जी वहाँ के एक
बड़े व्यापारी थे । शहर के
सभी छोटे-बड़े उनका बहुत सम्मान करते थे । किसी
में उनकी बात को गिराने की हिम्मत नहीं
थी ।
घर
में भी उनका ऐसा
ही रोब-दाब था । माँ
और हम सबके लिये
उनकी बात पत्थर की लकीर जैसी
थी । बाबू जी
बहुत कट्टर विचारों के थे ।
उनके अनुसार स्त्री का स्थान घर
के अंदर तक ही सीमित
था । माँ ने उनकी इस
बात का हमेशा मान
रखा । वे व्यक्त
तो नहीं करते थे परन्तु मुझे
पता है कि वे
हम सबसे, विशेषकर, मुझसे बहुत प्यार करते थे । कभी-कभी वे लाड़ में
कहते थे, “अपनी शालू का ब्याह तो
कलक्टर से करूँगा ।“
मेरी
शिक्षा एक बालिका विद्यालय
में हुई । वैसे तो
मैं पढ़ाई में ठीक थी परन्तु अंग्रेज़ी
से मुझे बहुत डर लगता था
। मेरी अध्यापिकाओं का भी अंग्रेज़ी
भाषा का ज्ञान शायद
कुछ अधिक नहीं था । इसीलिये
वे हम लोगों को
रटने का काम दे
कर छुट्टी पा जाती थीं
। धीरे-धीरे यह डर गहरा
बैठता गया ।
मैंने
हाईस्कूल और इण्टर की
परीक्षाएँ पास कर लीं ।
अंग्रेज़ी छोड़ कर सभी विषयों
में अच्छे अंक प्राप्त हुए थे । अंग्रेज़ी
के अंकों ने परिणाम खराब
कर दिये थे । बाबू
जी तो चाहते थे
कि अब मैं पढ़ाई
छोड़ कर घर के
कामों में रुचि लूँ । पता नहीं
कैसे हिम्मत जुटा कर मैंने बाबू
जी से आगे की
शिक्षा के लिये अनुमति
ली ।
मैंने
बी॰ए॰ में अंग्रेज़ी से पीछा छुड़ा
लिया था और इसीलिये तीनों वर्षों में मैं अच्छे अंक प्राप्त कर सकी ।
हमारे शहर के महाविद्यालय में
इससे आगे शिक्षा की व्यवस्था नहीं
थी । बड़े शहर
में और आगे पढ़ने
के लिये बाबू जी की आज्ञा
नहीं मिली । इस दौरान मेरा लगाव साहित्यिक हिन्दी
से हो गया था । मुझे मुँशी प्रेमचन्द, धर्मवीर भारती, बच्चन जी, शिवानी आदि लेखकों
और कवियों की रचनायें बहुत पसन्द थीं ।
बाबू
जी को अब मेरे विवाह की चिन्ता सताने
लगी थी । उन्होने
सरकारी अधिकारियों की मान-प्रतिष्ठा
देखी थी इसीलिये वे
उन्हे बहुत पसन्द करते थे । मेरे
लिये वह ऐसा ही
कोई रिश्ता चाह रहे थे । मुझे
आभास था कि ऐसे
व्यक्ति के साथ जीवन-यापन में साधारण शिक्षा और अंग्रेज़ी का
अल्प-ज्ञान बाधा उत्पन्न कर सकते हैं
। इसीलिये मैं अपने-जैसा ही परिवार चाहती
थी परन्तु बाबू जी से इस
विषय पर बात करने
की हिम्मत नहीं जुटा पायी ।
मेरा
भावी वर ढूँढ़ने के
लिये बाबू जी ने ज़मीन-आसमान एक कर दिया
। किसी परिचित ने उन्हे माधव
जी (मेरे पति) के परिवार के
बारे में बताया । माधव जी
का चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा में हो गया था
। उनके पिता जी भी भारतीय
प्रशासनिक सेवा में उच्च पद पर आसीन
थे ।
एक
दिन माधव जी का परिवार
मुझे देखने आया । घबराहट के
कारण मेरा बुरा हाल था । मैंने,
किसी प्रकार, उन लोगों के
प्रश्नों के उत्तर धीमे
स्वर में दिये । इसे नारी-सुलभ लज्जा मान लिया गया । असल में
बाबू जी ने उन
लोगों के दहेज के
लालच को भुना लिया
था । इस प्रकार मेरे विवाह का सौदा तय कर दिया गया था । बाबू
जी की प्रसन्नता का ठिकाना न था परन्तु मेरे मन में आशंकाएँ-ही-आशंकाएँ थीं । बाबू
जी कुशल व्यापारी ठहरे । बिना समय नष्ट किये, उन्होने, चट-मँगनी-पट-ब्याह की कहावत
को चरितार्थ कर दिया ।
विवाह बहुत
धूमधाम से हुआ । बाबू जी ने जैसे स्वर्ग को धरती पर उतार दिया था । मँहगी-सी गाड़ी से
ले कर छोटे-बड़े सामान और मोटी धनराशि के रूप में बाबू जी ने दहेज़ में कोई कसर नहीं
छोड़ी थी । विदा के समय, अपने जीवन में पहली बार, मैंने उन्हे इतना बिलख कर रोते देखा था । मेरे आँसुओं
का तो जैसे अंत ही नहीं था । मैं किसी को कैसे समझाती कि घर छूटने के दुःख के साथ ही
आगामी जीवन से जुड़ी आशंकायें बहुत डरा रही थीं ।
एक नये जीवन
का प्रारंभ हो रहा था । मेरा नया परिवार पुराने वाले से बहुत भिन्न था । यहाँ केवल
माधव जी एवं उनके माता-पिता ही थे
। अब मैं चौथी सदस्य बन कर आई थी । सभी ने मेरा स्वागत परंपरानुसार किया । घर के इकलौते
बेटे के विवाह का उल्लास साफ झलक रहा था । एकत्रित रिश्तेदार एवं अतिथिगण मुझसे अधिक
दहेज के सामान देखने में रुचि ले रहे थे ।
दूसरे दिन
ही हम दोनों हनीमून के लिये गोवा चले गए । हवाई यात्रा, समुद्र का किनारा, अंतरंग पल,
दर्शनीय स्थलों की सैर, होटल, स्वादिष्ट खाने आदि ने समय का पता ही नहीं लगने दिया
परन्तु शायद इन्ही सब के बीच आगामी अशान्ति के बीज पड़ने प्रारंभ हो गये थे । माधव जी
मुझसे जैसे निर्लज्ज व्यवहार की आशा कर रहे थे, परंपरागत पारिवारिक वातावरण के कारण,
मैं उसके प्रति असहज थी । कुछ समय बीतने पर शायद मैं धीरे-धीरे सहज हो भी सकती थी परन्तु
माधव जी की आतुरता और व्यग्रता के पास इतना समय नहीं था । एक सप्ताह बिता कर हम वापस
आये ।
नये
घर में जीवन का ढंग भी
नया था । हम
लोगों को हर दिन
किसी न किसी के
यहाँ दावत पर जाना होता
था । कुछ लोग
तो बहुत प्यार से मिलते थे
पर कहीं-कहीं व्यंगात्मक टिप्पणी भी सुननी पड़ती
थी । मेक-अप, कपड़े, खाने-पीने का ढंग, बोल-चाल का तरीका-पता
नहीं कितनी कमियाँ थीं मुझमें! घर आ कर
कटाक्ष्-बाण ही मिलते थे । मन
के एक कोने में
उम्मीद रहती थी कि शायद
माधव जी मेरा साथ
देगें परन्तु अक्सर वहाँ भी निराशा ही
हाथ लगती थी ।
दोनों
घरों के खान-पान
में भी बहुत अन्तर
था । हमारे घर
में चटपटा मसालेदार खाना बनता था परन्तु नये
घर में बिल्कुल सादा खाना खाया जाता था । मुझे
तो यह एकदम बेस्वाद
लगता था । हालाँकि
मैं भी समझती थी
कि यह स्वास्थ्य के
लिये अच्छा होता है परन्तु बचपन
से बनी आदतों को बदलने के
लिये कुछ तो समय चाहिये था ।
कुछ दिन बाद,
पांव फेरने की रस्म को निभाने, मैं बाबू जी के साथ मायके आ गई । अपनी ओर से मैंने खुशी-खुशी
नये अनुभव बताये परन्तु माँ-लोगों के पास शायद अपनी संतान के लिये दिव्य-दृष्टि होती
है । अकेले में माँ ने पूछ ही लिया, "बेटा, तुम खुश तो हो न?" अब तक बहुत
संयम से रोका गया बाँध बह निकला । बहुत देर तक हम दोनों रोते रहे ।
पूरा जीवन
माँ, बाबू जी की परछाँई बन कर रही थीं । इसलिये वह केवल यही समझाती रहीं, "बेटी,
अब वही तुम्हारा घर है । जैसा वे लोग चाहें वैसे ही तुम्हे रहना है । भगवान सब ठीक
करेंगे ।" मैंने उनकी बात को गाँठ बाँध कर अपने-आप में बदलाव लाने का निश्चय कर
लिया था । ईश्वर में मेरा भी अटूट विश्वास था ।
मैं अंग्रेज़ी
सिखाने की किताबें आदि भी ले आई थी और
पढ़ना प्रारंभ कर दिया था । साथ-साथ मैंने कपड़ों और मेक-अप में बदलाव, काँटे-छुरी-चम्मच
का प्रयोग, सादा खान-पान तथा बोल-चाल में भी सुधार लाने के प्रयत्न प्रारंभ कर दिये
। मैंने निश्चय किया कि कितनी भी बाधायें आयें, मैं अपने प्रयासों में कोई कमी नहीं
आने दूँगी । कुछ दिन मायके में बिता कर मैं अपने घर आ गई ।
माधव जी को
असम-काडर मिला था । वे बोंगईगाँव में एस॰डी॰एम॰ नियुक्त किये गये । हम दोनों असम पहुँच
गये । माधव जी अपने काम के प्रति ईमानदार एवं बहुत मेहनती थे । उन्हे जीवन में किसी
प्रकार के अधूरेपन या समझौते की आदत नहीं थी । इसीलिये उनके मन में मेरे प्रति कुछ
अरुचि-सी उत्पन्न हो गई थी। उन्हे मेरे प्रयासों से कोई सरोकार नहीं था । उन्हे तो
पत्नी के रूप में एक आधुनिक नारी चाहिये थी । मैंने अपने निश्चयानुसार संयम रखते हुए
अपने व्यवहार में मधुरता बनाये रखी । माधव जी ने अपने काम में व्यस्तता बढ़ा ली थी ।
मेरे न चाहते हुए भी हम दोनों दूर होते जा रहे थे । अब वे समारोहों में भी अकेले ही
चले जाते थे ।
इस बीच माधव
जी की पदोन्नति हो गई थी । वे अब तेजपुर के डी॰एम॰ बन गये थे । बाबू जी का मेरे लिये
देखा हुआ सपना पूरा हो गया था । मैं अब कलक्टर की पत्नी बन गयी थी परन्तु क्या माधव
जी के मन में कोई स्थान बना सकी थी? शायद नहीं । उनकी व्यस्तता और मुझसे दूरी थोड़ी
और बढ़ गई थी परन्तु मैंने अपने प्रयासों को बनाये रखा था । इसमें मदद के लिये भगवान
ने एक सहेली भेज दी ।
एक दिन घर
में मन नहीं लग रहा था । माधव जी ने कार्यालय जाते हुए मेरे परिवार पर व्यंगात्मक टिप्पणी
कर दी थी । उनके हृदयहीन कटु-व्यवहार ने आँखों में बरबस सावन का मौसम ला दिया था ।
अचानक घर बहुत याद आने लगा था । मैं समय बिताने के लिये पैदल ही बाज़ार चली गई । वहाँ
एक साड़ी की दूकान पर वह भी बैठी थी । दूकानदार की दुरूह असमिया-मिश्रित भाषा को समझने
में उसने मेरी मदद की । हम साथ ही बाहर निकले । पहले तो वह, मेरे पति के उच्च-पद की
गरिमा के कारण, मुझसे औपचारिकता के घेरे में रह कर बात कर रही थी पर धीरे-धीरे मैंने
अपने सहज व्यवहार से उसकी हिचक को दूर कर दिया
।
अचानक तेज़
बारिश आ गई । बचने के लिये हम दोनों सामने बनी एक चाय की दूकान के अंदर चले गये। बातचीत
साड़ी से प्रारम्भ हो कर कब व्यक्तिगत सीमा-रेखा को पार कर गई थी, पता ही नहीं चला ।
सुरक्षा-कारणों से माधव जी ने मुझे स्थानीय लोगों से दूरी बनाये रखने के निर्देश दे
रखे थे परन्तु उसके मधुर स्वभाव में एक अनोखा आकर्षण था ।
उसका नाम
पाखी सैकिया था । वह एक स्थानीय अंग्रेज़ी विद्यालय में कक्षा ५ में शिक्षिका थी । पति
श्री हेमन्त सैकिया की एक दूकान थी परन्तु उसकी कमाई उनके मदिरा-प्रेम की भेंट चढ़ जाती
थी । सम्पूर्ण परिवार की ज़िम्मेदारी उसके कन्धों पर थी । वह एक कुलीन परिवार से थी
। उसके धनाढ्य माता-पिता भी स्थानीय थे । अक्सर वे रुपये-पैसे से उसकी सहायता करते
रहते थे ।
मुझे ऐसा
लगा कि इतनी दूर परदेस में जैसे कोई अपना मिल गया । हालाँकि उसकी हिन्दी और मेरी अंग्रेज़ी
का स्तर एक जैसा ही था परन्तु एक-दूसरे के मन की भाषा समझने में हमें कोई परेशानी नहीं
हुई । बारिश तेज़ हो गई थी । मुझे पता ही नहीं लगा कि कब मैंने उसे अपनी पूरी कहानी
बता डाली ।
उसने मुझे
आश्वस्त किया कि अंग्रेज़ी भाषा उतनी भी कठिन नहीं है जितना मैं डरती थी । साथ ही प्रस्ताव
भी दिया कि वह इसमें मेरी भरपूर मदद कर सकती थी । उसने मेरे प्रयासों की भरपूर सराहना
की । इस थोड़ी-ही देर की बातचीत में मेरा मनोबल बहुत बढ गया था । वह मुझसे हिन्दी सीखना
चाहती थी । हमने मिलने का निश्चय किया और मैं उसके घर प्रतिदिन जाने लगी । उसका समझाने
का ढंग सरल और प्रभावशाली था ।
धीरे-धीरे
मेरा आत्मविश्वास बढ़ रहा था । कुछ समय में ही मेरे व्यक्तित्व में परिवर्तन आ गया था
परन्तु माधव जी ने तो मेरी ओर जैसे देखना ही छोड़ दिया था और अपने सरकारी कामकाज में
डूब से गये थे । एक प्रकार से यह अच्छा ही था क्योंकि मैं पाखी के साथ अपने तय मार्ग
पर बढ़ती जा रही थी । अब मैंने कम्प्यूटर सीखना भी शुरू कर दिया था और इन्टरनेट ने मेरे
समक्ष एक नई दुनिया के द्वार खोल दिये थे ।
जीवन इसी
गति से चल रहा था कि अचानक मुझे एक झंझावात का सामना करना पड़ा । कुछ समय से माधव जी
को अलगाववादी संगठनों की देश-विरोधी गतिविधियों से जूझना पड़ रहा था । वह मुझसे तो कुछ
नहीं बताते थे परन्तु टेलीफोन पर बातचीत, घबराहट एवं कार्यालय-कर्मियों से मुझे भी
कुछ जानकारी मिल रही थी । यह संगठन धनाढ्य व्यापारी-वर्ग से मोटी रकम जबरन वसूलता था
। न मिलने पर हत्या जैसा जघन्य अपराध इसके कार्यकर्ताओं के लिये सामान्य-सी बात थी
।
आपराधिक गतिविधियाँ
बहुत बढ़ गयी थीं । समाचार-पत्र ऐसे समाचारों से भरे रहते थे । हर ओर से सरकार और स्थानीय
प्रशासन की भरपूर आलोचना हो रही थी । उन पर ऐसे संगठनों के साथ मिली-भगत तक के गम्भीर
आरोप लग रहे थे । व्यापारी-वर्ग प्रदेश छोड़ कर जाने की तैयारी करने लगा था । परिणामतः
आर्थिक एवं बेरोजगारी की समस्यायें आने की आशंका सामने थी । माधव जी के ऊपर चारों ओर
से दवाब था । दूसरी ओर इन संगठनों की ओर से भी उन्हे प्रतिदिन धमकियाँ मिल रही थीं
। मैं बहुत चिन्तित हो
गई थी । ऐसे में मेरी पूजा-अर्चना बढ़ गई थी । जब तक माधव जी घर नहीं आ जाते थे मेरा
कलेजा मुँह में ही रहता था । घर और कार्यालय
में एक के बाद दूसरी बैठकों का दौर अनवरत रहता था ।
माधव जी एक
कुशल प्रशासक के रूप में जाने जाते थे । उन्होने भागने के स्थान पर सामना करने का निश्चय
कर लिया था । एक दिन उस संगठन का एक वरिष्ठ सदस्य माधव जी के कार्यालय में आ गया ।
उसने धमकी-भरे स्वर में माधव जी को अपनी कार्यवाहियाँ रोकने अथवा असम छोड़ कर चले जाने
को कहा । उसने अपना बड़ा-सा चाकू निकाल कर मेज पर रख दिया और न मानने पर जीवित न छोड़ने
की चुनौती दे दी । माधव जी के लिये यह दुस्साहस अत्यंत अपमानजनक था । उन्होने बिना
देर किये सिपाहियों को बुला कर उस व्यक्ति को गिरफ्तार करवा दिया ।
अब तो माधव
जी उस संगठन के निशाने पर आ गये थे । वे लोग अपने सदस्य को छोड़ने का दवाब बना रहे थे
पर माधव जी ने कई धाराओं के अन्तर्गत मुकदमा कायम कर उसे कारागार में डलवा दिया था
। माधव जी की सुरक्षा बढ़ा दी गई थी ।
एक दिन माधव
जी को उच्चाधिकारियों के साथ बैठक के लिये दिसपुर जाना था । पता नहीं क्यों मेरा मन
बहुत घबड़ा रहा था । मैंने जाने के लिये मना भी किया परन्तु वह बिना मेरी ओर देखे निकल
गए । फिर भी उनके जाते ही मैंने दुर्गा-सप्तशती का पाठ और महामृत्युन्जय मंत्र का जाप
आरंभ कर दिया ।
अचानक फोन
की घंटी बजी । धड़कते दिल से फोन उठाया तो आशंका सच साबित हुई । उस ओर माधव जी के एक
सुरक्षा-कर्मी बोल रहे थे । माधव जी की गाड़ी पर हमला हुआ था । वह ही उन लोगों के निशाने
पर थे । उन्हे चार गोलियाँ मारी गई थीं । सुरक्षाकर्मी भी घायल
हुये थे परन्तु उन लोगों ने जम कर मोर्चा लिया था और हमलावरों को भगा दिया था । वे
लोग माधव जी को ले कर गुवाहाटी के सरकारी अस्पताल पहुँच गये थे ।
भगवान की
कुछ ऐसी कृपा थी कि मेरे मन में घबराहट का स्थान दृढ़ता ने ले लिया था । मैं तुरन्त
पाखी और हेमन्त जी को ले कर गुवाहाटी के लिये निकल गई । रास्ता इतना लम्बा मुझे कभी
नहीं लगा था । पूरे रास्ते मन-ही-मन मेरी प्रार्थना चल रही थी । मैंने निश्चित किया
कि मुझे सावित्री का रूप धारण कर किसी भी कीमत पर अपने सत्यवान को मृत्यु के मुख से
वापस लाना था ।
अस्पताल में
माधव जी को शल्य-क्रिया के लिये ले गए थे । गोलियाँ निकाल दी गई थीं परन्तु अगले २४
घंटों में प्राणों का संकट बना हुआ था । खून बहुत बह गया था । मैंने २ बोतल खून दिया
। समय बहुत कठिन था। मैंने दौड़-भाग कर दवायें-इन्जेक्शन-ग्लूकोज़ और अन्य व्यवस्थायें
करीं । साथ-साथ मन में महामृत्युन्जय मंत्र का जाप भी चल रहा था । पाखी और हेमन्त जी
भी बराबर मेरे साथ-साथ थे । मेरे सास-ससुर दूर होने के कारण बहुत देर बाद पहुँच पाये
थे । बदहवासी के बावज़ूद शायद पहली बार उन लोगों की आँखों में मैंने अपने लिये स्नेह
और कृतज्ञता का भाव देखा ।
३६ घंटे बाद
माधव जी ने आँखें खोलीं । अब तक मैंने एक पल के लिये भी अपनी आँखें नहीं मूँदी थीं,
न अन्न का एक भी दाना मुँह में डाला था । डॉक्टरों का दल निगरानी कर रहा था । उन्होने
खतरा टल जाने का आश्वासन दिया । उसके बाद मैंने ईश्वर का धन्यवाद किया और कब बिस्तर
पर गिरी मुझे कुछ पता नहीं चला ।
१५ दिन बाद
हम लोग घर वापस आये । डॉक्टरों ने शायद माधव जी और मेरे सास-ससुर जी से मेरी कुछ अधिक
ही प्रशंसा कर दी थी । मेरी तो जैसे दुनिया ही बदल गई थी । माधव जी को पूर्णतया स्वस्थ
होने में ४ महीने लगे परन्तु यहीं से मेरे जीवन के सुखद पल प्रारम्भ हुए । मम्मी जी
और डैडी जी (सास-ससुर जी) ने वापस जाते समय आशीषों की झड़ी लगा दी । माँ-बाबू जी भी
कुछ दिन आ कर रहे थे । उनकी आँखों में मेरे लिये गर्व-मिश्रित-खुशी के आँसू थे । मैं अब सचमुच
कलक्टर की पत्नी बन गयी थी ।
सभी हमलावर
पकड़ लिये गये । इस घटना को बीते २ वर्ष हो गये हैं । जीवन का वह भाग एक दुःस्वप्न जैसा
लगता है । पाखी और हेमन्त जी अब पारिवारिक सदस्य जैसे हैं । हेमन्त जी का मदिरापान
कम हो गया है और उनका व्यापार अच्छा चलने लगा है । हमारी १ वर्ष की बेटी रिया बहुत चंचल है ।
माधव जी असम सरकार में संयुक्त- सचिव के पद पर दिसपुर आ गये हैं । मैं रिया के अच्छे
लालन-पालन के साथ-साथ एक एन॰जी॰ओ॰ भी चला रही हूँ ।
अपने जीवन
से मैंने यही निष्कर्ष निकाला है कि परिस्थितियों को बदला भी जा सकता है । आवश्यकता
केवल इस बात की है कि हम ईश्वर में दृढ़ विश्वास बनाये रखें, धैर्य का साथ न छोड़ें और
परिश्रम से पीछे न हटें ।

