
चटाक!
परेश का तमाचा पड़ा तो मेरे गाल पर था पर चोट अन्दर तक कर गया था । उसकी आँखों से चिंगारियाँ निकल रहीं थीं । मेरी सिसकियाँ रुक नहीं पा रहीं थीं । उसकी धाराप्रवाह गालियों और उठे हुए हाथ ने मुझे बहुत अंदर तक गहरा सदमा पहुंचाया था ।
क्रोध के आवेग से काँपता और बड़बड़ाता हुआ परेश कहीं बाहर चला गया था और मैं रोते-रोते गहरी सोच के भंवर में उतर गयी थी । आखिर गलती क्या थी मेरी? क्या हो गया था मेरे परेश को ? कितने सपने बुने थे हमने साथ साथ ? मुझे हमेशा पलकों पर बैठाने की जिद रहती थी उसकी । सब कहाँ खो गया था ?
मैं एक कुलीन, संस्कारी परिवार में जन्मी थी । मम्मी-पापा की इकलौती लाड़ली थी । दोनों शिक्षक थे । उनका आपसी व्यवहार अपने-आप में शिष्टाचार की अनुपम शिक्षा थी । इकलौती होने के बावजूद उन्होंने मुझे कभी बिगड़ने न दिया । सामान्य बच्चों की तरह मेरी भी जिद होती थी पर प्रोत्साहन, संयम और अनुशासन की स्नेह-पगी डोर से उन्होंने मुझे हमेशा बाँध कर रखा था । वे दोनों ही मेरी जीवनी-शक्ति थे । स्कूल और काॅलेज में मैं पढाई के अतिरिक्त खेल-कूद, वाद-विवाद, भाषण प्रतियोगिताएं, नृत्य-गीत सभी में आगे रहती थी और पुरस्कार लगातार मिलते रहते थे ।
काॅलेज में ही परेश से मुलाकात हुई । एक वाद-विवाद प्रतियोगिता में हम आमने-सामने थे । ये पहला अवसर था जब मुझे अपना प्रथम पुरस्कार किसी के साथ बांटना पड़ा । धीरे-धीरे बातचीत शुरू हुई और सिलसिला आगे बढ़ा । और भी कई प्रतियोगिताओं में हम दोनों ने भाग लिया । कभी वो प्रथम आता था तो कभी मैं । समय बीतता गया और उसका विनम्र आकर्षण मुझे अपनी और खींचने लगा ।
जीवन में सब कुछ वही था पर कुछ नये रंग भरने लगे थे । परेश के बारे में जानने का मन करता था । जितना जाना उससे वह और भी अच्छा लगने लगा था । उसके पिता नहीं थे, चाचा ने पाला था । उनकी कोई संतान न होने के कारण वो परेश को बेटे से भी अधिक प्यार देते थे।
समय बीतता गया और ये परिचय एक मित्रता और फिर सामीप्य में बदलने लगा था । मैंने बी.काॅम.किया । फिर चार्टर्ड एकाउंटेंसी करना शुरू किया । मेहनत और लगन में कोई कमी नहीं थी इसलिए ३ साल में सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ते हुए चार्टर्ड अकाउंटेंट भी बन गयी । जिस फर्म से मैं सीख रही थी उन्होंने ही मुझे मेरी प्रतिभा देख कर नौकरी पर रख लिया ।
परेश भी चार्टर्ड एकाउंटेंसी कर रहा था पर दो बार अनुतीर्ण होने के कारण वह मुझसे एक साल बाद चार्टर्ड अकाउंटेंट बन पाया । हालांकि इससे हमारे रिश्तों में कोई अंतर नहीं पड़ा था । परेश ने अपनी फर्म बना कर काम शुरु किया ।
अब हमने साथ-साथ सपने देखने शुरू कर दिए थे । मैं परेश को घर ले कर आयी थी । मम्मी-पापा जाति-बंधन को तो नहीं मानते थे पर पता नहीं क्यों परेश को ले कर वे कुछ असहज से थे । शायद उनकी अनुभवी आँखों ने कुछ ऐसा भाँप लिया था जो मेरी भावुकता नहीं देख पाई थी। पापा ने मुझे समझाने की कोशिश भी की थी । वे और भी रिश्ते देख रहे थे पर मैं तो परेश के लिए जैसे पागल थी । पहली बार मैंने मम्मी-पापा से भरपूर जिद की और एक विद्रोहात्मक रूप ले कर अपनी बात मनवाई थी । फिर उन दोनों ने मेरे आगे आत्मसमर्पण कर दिया था।
परेश भी मुझे अपने घर ले गया था। उसके परिवार को मैं अच्छी तो लगी पर शायद परेश को ले कर उनकी दहेज-सम्बन्धी अपेक्षाएँ भी रही होंगी जो मेरे मम्मी-पापा पूरा करने में असमर्थ थे । हम दोनों ने अब शादी का निर्णय कर लिया था । एक सादे से समारोह में हम विवाह के पवित्र बँधन में बँध गए थे । मेरे मम्मी पापा और परेश के परिवार के लोग सम्मिलित तो थे पर शायद केवल रस्मी तौर पर । फिर भी हम दोनों बहुत खुश थे । परेश का छोटा सा फ्लैट था पर यही हमारा प्यारा सा आशियाना बन गया था । शुरू के ६ महीने एक सुनहरे सपने की तरह बीत गए थे । परेश का प्यार मुझे गुदगुदाता-सा अंदर तक छू जाता था । हम दोनों ही एक दूसरे के बिना रह नहीं पाते थे ।
पलक झपकते शादी के बाद का एक साल निकल गया था । मुझे पता लगा कि मैं माँ बनने वाली हूँ । सृजन के इस सुखद अहसास को एक स्त्री से बेहतर कोई नहीं समझ सकता । मेरे लिए यह हम दोनों के प्यार की एक बहुमूल्य निशानी थी । मैंने चहकते हुए यह खबर परेश को सुनायी और यहीं पर मुझे पहला झटका लगा ।
परेश अभी बच्चे की झंझट नहीं चाहता था । मेरे पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गयी थी । मेरे रोने-मनाने का परेश पर कोई असर नहीं हुआ । एक तरह से वो जबरदस्ती मुझे लेडी डाॅक्टर के पास ले गया । मुझे गर्भपात के एक भयावह अनुभव से गुजरने पड़ा । शरीर का कष्ट तो बर्दाश्त करना ही पड़ा पर मन का दर्द किसी को समझाया ही नहीं जा सकता था । मेरे अंदर बचपन की किलकारियां मर गयी थीं और एक सूनापन घर कर गया था । सबसे बड़ा कष्ट मुझे परेश की दूरी से हो रहा था । उसे जैसे मेरे कष्टों से कोई सरोकार ही नहीं था । उसके लिए तो यह एक सामान्य सी बात थी जिससे एक झंझट जैसे दूर हो गया था ।
कुछ दिन आराम करने के बाद, सब कुछ पीछे छोड़ कर, मैं ऑफिस जाने लगी ।मैंने खुद को मशीन की तरह काम में झोंक दिया । मेहनत रंग लाने लगी । फर्म में काम बहुत बढ़ गया । फर्म को बहुत फायदा हो रहा था । अगले दो साल में मेरी मेहनत और लगन के फलस्वरूप मुझे पार्टनर बना दिया गया । यह मेरे लिए जीवन में एक बहुत बड़ी सफलता थी । परेश ने खुशी तो दिखाई पर शायद वो अंदर से नहीं थी ।
उसकी फर्म ठीक से चल तो रही थी पर फिर भी वह संतुष्ट नहीं था । उसका व्यवहार कुछ बदलने लगा था । हम दोनों अब साथ-साथ होते हुए भी कुछ दूर से होने लगे थे । फिर भी मैंने अपने तौर से कभी कोई शिकायत नहीं की थी । कभी-कभी की बजाय अब वह रोज व्हिस्की पीने लगा था । व्हिस्की की मात्रा भी दिन.प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी । अब हम दोनों में छोटी-सी बात बहस में बदल जाती थी । ऐसा लगता था कि मेरा आगे बढ़ना उसे स्वीकार नहीं हो पा रहा था ।
उधर पापा की तबियत कुछ गड़बड़ रहने लगी थी । उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा तो कभी भी नहीं था पर अब वो बहुत कमजोर हो गए थे । जांच में पता लगा कि ह्रदय की दो धमनियों में रूकावट आ गयी थी । उच्च रक्तचाप और मधुमेह भी शरीर में पहुँच गए थे । गुर्दे ठीक से काम नहीं कर रहे थे । अस्पताल और डाॅक्टरों के चक्कर बढ़ गए थे ।
एक रात अचानक मम्मी का फोन आया । पापा की हालत बहुत गंभीर थी । हम तुरंत अस्पताल भागे । दो दिनों तक डाॅक्टरों की बहुत कोशिशों के बाद भी पापा हमें छोड़ कर चले गए । मम्मी ने बाद में बताया कि मेरे विवाह के बाद वह बहुत चुप रहने लगे थे और मेरे लिए उनकी चिंता बहुत बढ़ गयी थी पर मैं और परेशान न हो जाऊँ, इसलिये उन्होने मुझे कभी कुछ नहीं बताया । अब मुझे उनके दर्द और उनकी कमी का बहुत अहसास हो रहा था । मम्मी भी अकेली पड़ जाने के कारण बहुत कमजोर हो गयी थीं ।
परेश इस सब में साथ होते हुए भी साथ न था । इधर उसकी परेशानियां कुछ बढ़ रही थीं । उसकी फर्म में काम ठीक से नहीं चल रहा था । उसके स्वभाव में कुछ रूखापन तो आ ही गया था, इधर बेवजह का चिड़चिड़ापन भी बढ़ गया था । मैंने स्थिति को सँभालने की पूरी कोशिश की पर अब कुछ मुश्किल सा लगने लगा था ।
उस रात बहुत दिन बाद साथ-साथ हम एक पार्टी में गए थे । वहां मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी मिल गए थे । शायद ये मेरी बदकिस्मती ही थी कि उन्होंने परेश से मेरी बहुत अधिक तारीफ कर दी । उनसे तो परेश ने कुछ भी नहीं कहा पर उस दिन पार्टी में उसकी व्हिस्की कुछ ज्यादा ही हो गयी थी । किसी तरह से मैं उसे बैठा कर कार ले कर घर आयी । रात में हम लोग सो गए । सवेरे भी मैंने रात की पार्टी में व्हिस्की अधिक पीने के लिये पर नहीं टोंका पर उसी ने बात शुरू करते हुए मेरे चरित्र पर भद्दे तरीके से आरोप लगा दिए । ये मेरी बर्दाश्त के बाहर था क्योंकि मैंने सपने में भी कभी परेश के अतिरिक्त किसी के बारे नहीं सोचा था । मैंने विनम्र लेकिन दृढ़ प्रतिरोध किया और उसका उत्तर परेश ने उस तमाचे से दिया था ।
इस बात को छः महीने हो गए हैं । इस बीच कई बार मैंने स्थिति को सँभालने की बहुत कोशिश की पर धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि दरार अब खाई में बदलती जा रही थी । रातों को जागना मेरी नियति बन गई थी पर वहीं बगल में परेश नशे में चूर खुर्राटे भरता सोता रहता था । बहते आंसुओं के बीच मैंने कई बार सोचा कि आखिर मेरी गलती क्या थी । जीवन में थोड़ी सी सफलता का मूल्य इतना अधिक क्यों चुकाना पड़ रहा था ? परेश की कुंठा और उसका अहं हमारे जीवन को नर्क कर गया था । कई बार यहाँ तक सोचा कि सब कुछ छोड़ दूँ पर इतना आगे आने के बाद करियर से एक मोह.बंधन सा हो गया था ।
गाली-गलौज और मार-पीट अब परेश द्वारा बातचीत की भाषा बन गयी थी । कभी-कभी दिमाग में आत्महत्या जैसा कायरतापूर्ण विचार भी कौंधता था परन्तु मम्मी का चेहरा सामने आ कर रोक देता था। उनको में अकेला नहीं छोड़ सकती थी। मैंने बहुत कोशिश कर के इसका असर अपने व्यावसायिक जीवन पर नहीं आने दिया । परिणामतः कार्यालय में मैं पूर्णतया मशीन बन गयी थी । इस के कारण मेरी फर्म और फर्म में मैं आगे और आगे बढ़ती जा रही थी ।
एक ही क्षेत्र में रहने के कारण परेश के बारे में भी पता लगता रहता था । उसका व्यवहार सबके साथ बहुत खराब होने लगा था जिसके कारण लोग उससे दूरियां बनाने लगे थे । शराब का सेवन दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था। मेरे लाख कोशिशों के बावजूद हमारे बीच धीरे-धीरे जैसे एक लोहे की दीवार आ गयी थी जो ऊँची और ऊँची होती जा रही थी ।
मुझे लगने लगा था कि शायद आगे रास्ता बंद सा हो रहा था । तब मैंने निर्णय किया । मेरी मम्मी को मेरी जरुरत थी । मैंने बहुत ही ठंढे तरीके से परेश को बता दिया कि मैं मम्मी के पास जा रही हूँ । मन के अंदर एक क्षीण सी आशा थी कि शायद अब भी मेरा परेश मुझे रोक लेगा पर उसने तो सुन कर भी अनसुना कर दिया।
मैं मम्मी के पास वापस आ गयी। कुछ दिनों तक एक इंतजार था कि शायद कोई फोन या मैसेज आ जाएगा पर फिर मुझे अहसास हो गया कि परेश को मुझसे छुटकारा चाहिए था ।
मैंने तय कर लिया है कि मेरा अतीत ही अब मेरा भविष्य बनेगा । पापा और मम्मी ने जो लाड़-प्यार मुझ पर बचपन में लुटाया था उसका कर्ज चुकाने का समय आ गया है । उम्र के इस पड़ाव पर अब मैं मम्मी का सहारा बनूंगी ।
जीवन का अर्थ अब मुझे खुद ढूंढ़ना है । मुझे भगवान में अटूट विश्वास है कि वह मुझे इसके लिए शक्ति देंगे ।
Friends,
ReplyDeleteI invite your comments. You have to point out if there was any fault on the part of the protagonist.
It reflects upon the sad state of male dominance in which we feel that only the male has the right to be superior.